मक्का के इस मैदान में मिलती है ‘शैतान’ को सजा, बकरीद से क्या है कनेक्शन?
बकरीद से पहले मक्का में होने वाली ‘रमी अल-जमरात’ रस्म दुनियाभर में चर्चा का विषय बनती है। इस परंपरा में हज यात्री प्रतीकात्मक रूप से शैतान को पत्थर मारते हैं। जानिए इसका धार्मिक महत्व और बकरीद से इसका खास संबंध।
Eid al-Adha यानी बकरीद सिर्फ कुर्बानी का त्योहार नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहरी धार्मिक मान्यताएं और इतिहास जुड़ा हुआ है। हर साल हज यात्रा के दौरान Jamarat Bridge में होने वाली एक खास रस्म दुनियाभर के लोगों का ध्यान खींचती है। इस रस्म को “रमी अल-जमरात” कहा जाता है, जिसमें हज यात्री प्रतीकात्मक रूप से शैतान को पत्थर मारते हैं।
यह रस्म Mecca के पास स्थित मीना के मैदान में निभाई जाती है। इस स्थान पर तीन बड़े स्तंभ बनाए गए हैं, जिन्हें शैतान का प्रतीक माना जाता है। लाखों हज यात्री इन स्तंभों पर कंकड़ फेंकते हैं।
इस परंपरा का संबंध Prophet Ibrahim की उस धार्मिक कथा से जुड़ा है, जब उन्हें अल्लाह के आदेश पर अपने बेटे की कुर्बानी देने का निर्देश मिला था। मान्यता है कि इस दौरान शैतान ने उन्हें अल्लाह के आदेश से रोकने और बहकाने की कोशिश की। तब हजरत इब्राहिम ने शैतान को कंकड़ मारकर उसे ठुकरा दिया था।
इसी घटना की याद में आज भी हज यात्री रमी अल-जमरात की रस्म निभाते हैं। यह बुराई, लालच और गलत रास्ते को ठुकराने का प्रतीक माना जाता है। इसके बाद ही कुर्बानी की रस्म अदा की जाती है, जो बकरीद का सबसे अहम हिस्सा मानी जाती है।
Saudi Arabia में हर साल इस रस्म के दौरान सुरक्षा के बेहद कड़े इंतजाम किए जाते हैं, क्योंकि लाखों लोग एक साथ इस धार्मिक प्रक्रिया में शामिल होते हैं। प्रशासन भीड़ नियंत्रण और यात्रियों की सुरक्षा के लिए आधुनिक तकनीक और विशेष व्यवस्थाएं करता है।
धार्मिक जानकारों के अनुसार, बकरीद का संदेश सिर्फ कुर्बानी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह इंसान को अपने अंदर की बुराइयों और लालच पर जीत हासिल करने की सीख भी देता है। रमी अल-जमरात इसी संदेश का प्रतीक मानी जाती है।
Bakrid 2026 को लेकर भी दुनियाभर के मुस्लिम समुदाय में तैयारियां शुरू हो चुकी हैं। सोशल मीडिया पर मीना और जमरात से जुड़े वीडियो और तस्वीरें तेजी से वायरल हो रही हैं, जिससे लोगों में इस रस्म को जानने की उत्सुकता बढ़ गई है।
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