दो साल में दो टास्क फोर्स: 2024 की सिफारिशें क्यों नहीं बदल पाईं सिस्टम, 2026 की नई टीम से क्या हैं उम्मीदें?
NEET और अन्य परीक्षा पेपर लीक मामलों के बाद केंद्र सरकार ने 2024 के बाद 2026 में दूसरी हाई-पावर्ड टास्क फोर्स बनाई है। इस बार नंदन नीलेकणि की अगुवाई में गठित टीम में टेक्नोलॉजी, सुरक्षा, शिक्षा और प्रशासन के विशेषज्ञ शामिल हैं। सवाल यह है कि आखिर 2024 और 2026 की टीम में ऐसा क्या फर्क है, जो देश की परीक्षा व्यवस्था को पूरी तरह बदल सकता है?
देश की परीक्षा व्यवस्था को लेकर एक बार फिर बड़ा बदलाव होने जा रहा है। NEET और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में लगातार सामने आए पेपर लीक मामलों के बाद केंद्र सरकार ने दूसरी बार परीक्षा सुधार के लिए हाई-पावर्ड टास्क फोर्स का गठन किया है। दिलचस्प बात यह है कि यह पहली बार नहीं है। इससे पहले भी 2024 में परीक्षा सुधारों के लिए एक विशेषज्ञ समिति बनाई गई थी, जिसने कई अहम सिफारिशें दी थीं। लेकिन दो साल बाद फिर नई टास्क फोर्स का गठन इस सवाल को जन्म देता है कि आखिर 2024 की समिति और 2026 की टीम में ऐसा क्या अंतर है, जो इस बार देश की परीक्षा प्रणाली को बदलने का दावा किया जा रहा है।
2024 में गठित समिति का मुख्य उद्देश्य तत्कालीन परीक्षा विवादों की समीक्षा करना और नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) की कार्यप्रणाली में सुधार के सुझाव देना था। उस समिति ने परीक्षा प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाने, प्रश्नपत्रों की सुरक्षा बढ़ाने, परीक्षा केंद्रों की निगरानी मजबूत करने, डिजिटल ट्रैकिंग सिस्टम विकसित करने और परीक्षा संचालन में जवाबदेही बढ़ाने जैसी कई महत्वपूर्ण सिफारिशें दी थीं। हालांकि विशेषज्ञों का मानना रहा कि इनमें से कई सुझाव पूरी तरह लागू नहीं हो सके या उनकी गति अपेक्षा से काफी धीमी रही। इसी कारण पेपर लीक की घटनाएं पूरी तरह रुक नहीं सकीं और परीक्षा प्रणाली पर लगातार सवाल उठते रहे।
2026 की नई टास्क फोर्स का सबसे बड़ा अंतर इसकी संरचना और उद्देश्य में दिखाई देता है। इस बार केवल शिक्षा विशेषज्ञों पर निर्भर रहने के बजाय सरकार ने तकनीक, साइबर सुरक्षा, खुफिया तंत्र, प्रशासन और लॉजिस्टिक्स के विशेषज्ञों को एक साथ लाया है। इस हाई-पावर्ड टास्क फोर्स की कमान इंफोसिस के सह-संस्थापक और आधार परियोजना के प्रमुख वास्तुकार नंदन नीलेकणि को सौंपी गई है। उनके साथ पूर्व ISRO प्रमुख एस. सोमनाथ, पूर्व आईबी निदेशक तपन डेका, IIT मद्रास के निदेशक वी. कामकोटी, पूर्व शिक्षा सचिव अनीता करवाल और प्रशासनिक एवं लॉजिस्टिक्स विशेषज्ञ अमृत लाल मीणा जैसे सदस्य शामिल किए गए हैं। यह विविधता बताती है कि सरकार अब परीक्षा सुधार को केवल प्रशासनिक चुनौती नहीं, बल्कि तकनीकी और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा विषय मान रही है।
नई टास्क फोर्स का फोकस भी पहले से कहीं अधिक व्यापक है। इसका उद्देश्य केवल पेपर लीक रोकना नहीं, बल्कि पूरे परीक्षा तंत्र को तकनीक आधारित, सुरक्षित, पारदर्शी और भरोसेमंद बनाना है। सरकार चाहती है कि भविष्य में प्रश्नपत्रों के निर्माण से लेकर वितरण, परीक्षा केंद्रों की निगरानी, उम्मीदवारों की पहचान, डेटा सुरक्षा और परिणामों की प्रक्रिया तक हर चरण में आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल किया जाए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी स्पष्ट किया है कि भविष्य की परीक्षा प्रणाली "विश्वसनीय, पारदर्शी और अधिकतम तकनीक आधारित" होनी चाहिए।
विशेषज्ञों का मानना है कि नंदन नीलेकणि की मौजूदगी इस पूरी कवायद की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है। आधार और डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे विशाल प्रोजेक्ट्स का नेतृत्व करने के कारण उन्हें बड़े पैमाने पर सुरक्षित डिजिटल सिस्टम विकसित करने का अनुभव है। माना जा रहा है कि उनकी अगुवाई में परीक्षा प्रणाली में एन्क्रिप्टेड प्रश्नपत्र, रियल-टाइम मॉनिटरिंग, डिजिटल ऑडिट ट्रेल, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) आधारित निगरानी और साइबर सुरक्षा जैसे आधुनिक समाधान शामिल किए जा सकते हैं। यही वजह है कि इस बार सरकार तकनीकी सुधारों पर पहले से कहीं अधिक जोर देती दिखाई दे रही है।
2024 और 2026 की समितियों के बीच दूसरा बड़ा अंतर राजनीतिक और प्रशासनिक परिस्थितियों का भी है। 2024 में सरकार पर सुधारों की मांग जरूर थी, लेकिन 2026 में लगातार पेपर लीक विवादों, छात्र आंदोलनों और व्यापक सार्वजनिक दबाव के बाद सरकार ने परीक्षा सुधारों को सर्वोच्च प्राथमिकता दी है। इसी क्रम में परीक्षा प्रणाली में बदलाव के लिए नई टास्क फोर्स बनाई गई और संसद में पेपर लीक के खिलाफ कानून को और मजबूत बनाने के लिए संशोधन विधेयक भी पेश किया गया। इससे संकेत मिलता है कि इस बार केवल सिफारिशें तैयार करने तक सीमित रहने के बजाय उन्हें कानूनी और संस्थागत ढांचे के साथ लागू करने की तैयारी भी की जा रही है।
नई टास्क फोर्स के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि वह ऐसी व्यवस्था विकसित करे जिसमें प्रश्नपत्र लीक होने की संभावना न्यूनतम हो, परीक्षा केंद्रों पर किसी प्रकार की धांधली न हो और पूरे देश में एक समान सुरक्षा मानक लागू किए जा सकें। इसके लिए डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करना, साइबर सुरक्षा बढ़ाना, परीक्षा एजेंसियों की जवाबदेही तय करना और जांच एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करना आवश्यक होगा। यदि इन क्षेत्रों में ठोस सुधार लागू होते हैं, तो भविष्य में छात्रों का परीक्षा प्रणाली पर भरोसा काफी हद तक बहाल हो सकता है।
हालांकि कई शिक्षा विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि केवल नई समिति बना देना पर्याप्त नहीं होगा। 2024 की तरह यदि इस बार भी सिफारिशें फाइलों तक सीमित रह गईं, तो अपेक्षित बदलाव संभव नहीं होगा। वास्तविक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि सरकार इन सुझावों को कितनी तेजी से लागू करती है, परीक्षा एजेंसियां उन्हें किस स्तर तक अपनाती हैं और राज्यों के साथ कितना प्रभावी समन्वय स्थापित किया जाता है।
कुल मिलाकर, 2024 और 2026 की टास्क फोर्स के बीच सबसे बड़ा अंतर उनके दृष्टिकोण, संरचना और प्राथमिकताओं में दिखाई देता है। जहां पहली समिति मुख्य रूप से परीक्षा सुधारों के सुझाव देने तक सीमित थी, वहीं नई टीम तकनीक, साइबर सुरक्षा, प्रशासन और कानूनी सुधारों को एकीकृत करते हुए पूरे परीक्षा तंत्र को नए सिरे से तैयार करने का लक्ष्य लेकर चल रही है। आने वाले महीनों में इस टास्क फोर्स की सिफारिशें यह तय करेंगी कि भारत की परीक्षा प्रणाली केवल कागज पर बदलेगी या वास्तव में छात्रों के लिए अधिक सुरक्षित, पारदर्शी और भरोसेमंद बन पाएगी।
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