आप भी करते हैं ऑनलाइन शॉपिंग? हिडन चार्जेज के नाम पर कंपनियों ने ग्राहकों से वसूले 28,000 करोड़ रुपये!
अगर आप ऑनलाइन शॉपिंग करते हैं तो यह खबर आपके लिए बेहद जरूरी है। एक नई रिपोर्ट के मुताबिक भारत में ऑनलाइन खरीदार हर साल 25,000 से 28,000 करोड़ रुपये तक का नुकसान छिपे हुए चार्जेज, फोर्स्ड ऐड-ऑन, सब्सक्रिप्शन ट्रैप और अन्य "डार्क पैटर्न" के कारण झेल रहे हैं। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि करोड़ों उपभोक्ता बिना जाने अतिरिक्त रकम चुका रहे हैं।
ऑनलाइन शॉपिंग आज करोड़ों भारतीयों की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुकी है। किराने के सामान से लेकर इलेक्ट्रॉनिक्स, कपड़े, ब्यूटी प्रोडक्ट्स और यात्रा बुकिंग तक, लगभग हर चीज अब मोबाइल स्क्रीन पर उपलब्ध है। लेकिन इस सुविधा के पीछे एक ऐसी सच्चाई सामने आई है जिसने उपभोक्ताओं की चिंता बढ़ा दी है।
एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, भारत के ऑनलाइन खरीदार हर साल करीब 25,000 करोड़ से 28,000 करोड़ रुपये तक का नुकसान झेल रहे हैं। इसकी वजह कोई साइबर हैकिंग या बैंक फ्रॉड नहीं, बल्कि ई-कॉमर्स और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर इस्तेमाल किए जाने वाले तथाकथित "डार्क पैटर्न" हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक, देश के लगभग 304 मिलियन ऑनलाइन खरीदारों में से 88 प्रतिशत उपभोक्ता हर महीने औसतन 78 से 87 रुपये तक अतिरिक्त खर्च कर रहे हैं। यह रकम सुनने में भले ही छोटी लगे, लेकिन करोड़ों लोगों के स्तर पर इसका कुल आंकड़ा हजारों करोड़ रुपये तक पहुंच जाता है।
डार्क पैटर्न ऐसे डिजिटल डिजाइन या तरीके होते हैं जो उपभोक्ताओं को अनजाने में अतिरिक्त भुगतान करने, अनचाही सेवाएं चुनने या ऐसे फैसले लेने के लिए प्रेरित करते हैं जिन्हें वे सामान्य परिस्थितियों में शायद न चुनें। इनमें सबसे आम तरीका है हिडन चार्जेज यानी छिपे हुए शुल्क।
कई बार ग्राहक किसी उत्पाद को देखकर उसकी कीमत से आकर्षित हो जाता है, लेकिन जब वह भुगतान के अंतिम चरण तक पहुंचता है तो प्लेटफॉर्म डिलीवरी फीस, प्लेटफॉर्म फीस, सुविधा शुल्क, हैंडलिंग चार्ज या अन्य शुल्क जोड़ देता है। इस प्रक्रिया को "ड्रिप प्राइसिंग" कहा जाता है। रिपोर्ट के अनुसार, 63 प्रतिशत ऑनलाइन भुगतान उपयोगकर्ता अब इस तरह के छिपे हुए शुल्कों का सामना कर रहे हैं, जबकि 2024 में यह आंकड़ा 52 प्रतिशत था।
यही नहीं, कई प्लेटफॉर्म ग्राहकों को ऐसी सेवाओं या विकल्पों के लिए मजबूर करते हैं जिन्हें वे वास्तव में नहीं चाहते। उदाहरण के तौर पर, पहले से टिक किए गए सब्सक्रिप्शन बॉक्स, अतिरिक्त बीमा, प्रीमियम डिलीवरी या अन्य ऐड-ऑन सेवाएं ग्राहक के बिल में जोड़ दी जाती हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि 73 प्रतिशत प्लेटफॉर्म किसी न किसी रूप में ऐसे "फोर्स्ड एक्शन" का इस्तेमाल करते हैं।
एक और बड़ा तरीका है "बेट एंड स्विच"। इसमें ग्राहक को एक आकर्षक ऑफर या कम कीमत दिखाई जाती है, लेकिन भुगतान के समय उसे अलग कीमत या अलग शर्तों का सामना करना पड़ता है। इससे ग्राहक भ्रमित हो जाता है और कई बार समय बचाने के लिए वह अतिरिक्त भुगतान भी कर देता है।
सबसे दिलचस्प बात यह है कि ज्यादातर उपभोक्ता इन तरीकों के बारे में जानते हैं, फिर भी उनका शिकार बन जाते हैं। रिपोर्ट के अनुसार 81 प्रतिशत लोगों ने माना कि वे डार्क पैटर्न के बारे में जानते हैं, लेकिन 85 प्रतिशत लोगों ने स्वीकार किया कि वे कभी न कभी इनसे प्रभावित हुए हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि ये तरीके मानव मनोविज्ञान का फायदा उठाते हैं। "सिर्फ 2 सीट बची हैं", "ऑफर कुछ मिनटों में खत्म होगा", "अभी खरीदें" जैसे संदेश ग्राहकों पर दबाव बनाते हैं और उन्हें जल्दबाजी में फैसला लेने के लिए प्रेरित करते हैं। यही कारण है कि जागरूक उपभोक्ता भी कई बार इन जालों में फंस जाते हैं।
रिपोर्ट में यह भी चेतावनी दी गई है कि यदि ऐसे तरीके जारी रहे तो केवल उपभोक्ताओं का पैसा ही नहीं, बल्कि डिजिटल कॉमर्स सेक्टर पर लोगों का भरोसा भी प्रभावित हो सकता है। अनुमान है कि उपभोक्ताओं के व्यवहार में बदलाव के कारण 55,000 करोड़ रुपये से अधिक का व्यापारिक मूल्य जोखिम में पड़ सकता है, क्योंकि लोग खर्च कम कर सकते हैं, अधिक तुलना कर सकते हैं या दूसरे प्लेटफॉर्म्स की ओर जा सकते हैं।
हालांकि सरकार और नियामक एजेंसियां इस समस्या को लेकर पहले से सक्रिय हैं। उपभोक्ता संरक्षण से जुड़े नियमों के तहत कई प्रकार के डार्क पैटर्न को अनुचित व्यापारिक व्यवहार माना गया है। बावजूद इसके, रिपोर्ट का दावा है कि इन प्रथाओं को पूरी तरह रोकने में अभी भी चुनौतियां बनी हुई हैं।
उपभोक्ताओं के लिए विशेषज्ञों की सलाह है कि किसी भी ऑनलाइन खरीदारी के दौरान अंतिम भुगतान पेज को ध्यान से देखें, पहले से चुने गए विकल्पों को हटाएं, सब्सक्रिप्शन और अतिरिक्त सेवाओं की जांच करें तथा केवल आकर्षक ऑफर देखकर जल्दबाजी में भुगतान न करें।
ऑनलाइन शॉपिंग की दुनिया जितनी सुविधाजनक है, उतनी ही सतर्कता की भी मांग करती है। क्योंकि कई बार असली कीमत प्रोडक्ट की नहीं, बल्कि उन छिपे हुए शुल्कों की होती है जो आखिरी क्लिक से ठीक पहले सामने आते हैं।
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