शराब और सिगरेट नहीं, अब इस नए नशे की गिरफ्त में युवा! AIIMS के डॉक्टर ने बताया कितना खतरनाक है ट्रेंड

युवाओं में शराब और सिगरेट से अलग एक नया नशा तेजी से बढ़ रहा है। AIIMS के विशेषज्ञों के अनुसार, सोशल मीडिया, शॉर्ट वीडियो और लगातार स्क्रीन पर बिताया जाने वाला समय मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर असर डाल सकता है। जानिए यह लत कितनी खतरनाक है और इससे कैसे बचा जा सकता है।

Jun 15, 2026 - 16:32
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शराब और सिगरेट नहीं, अब इस नए नशे की गिरफ्त में युवा! AIIMS के डॉक्टर ने बताया कितना खतरनाक है ट्रेंड

एक समय था जब नशे का नाम लेते ही लोगों के मन में शराब, सिगरेट या अन्य मादक पदार्थों की तस्वीर उभरती थी। लेकिन बदलती दुनिया और तेजी से बढ़ती तकनीक ने नशे की परिभाषा को भी बदल दिया है। आज के दौर में युवाओं के बीच एक ऐसा नया एडिक्शन तेजी से फैल रहा है, जो दिखाई नहीं देता, लेकिन धीरे-धीरे उनके मानसिक, शारीरिक और सामाजिक जीवन को प्रभावित कर रहा है। विशेषज्ञ इसे "डिजिटल एडिक्शन" या "डोपामिन एडिक्शन" के नाम से जानते हैं।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों और मानसिक रोग चिकित्सकों का मानना है कि स्मार्टफोन, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, ऑनलाइन गेमिंग और शॉर्ट वीडियो कंटेंट ने युवाओं के व्यवहार में बड़ा बदलाव ला दिया है। मोबाइल फोन अब सिर्फ बातचीत या जानकारी हासिल करने का साधन नहीं रह गया है, बल्कि यह लोगों की दिनचर्या का ऐसा हिस्सा बन चुका है जिसके बिना कई लोग खुद को अधूरा महसूस करने लगे हैं।

AIIMS के विशेषज्ञों के अनुसार, डिजिटल प्लेटफॉर्म इस तरह डिजाइन किए जाते हैं कि उपयोगकर्ता अधिक से अधिक समय तक उनसे जुड़े रहें। हर नया नोटिफिकेशन, हर लाइक, हर कमेंट और हर नया वीडियो दिमाग में डोपामिन रिलीज करता है। डोपामिन वह रसायन है जो खुशी, उत्साह और संतुष्टि की भावना पैदा करता है। यही कारण है कि जब कोई व्यक्ति सोशल मीडिया स्क्रॉल करता है या लगातार वीडियो देखता है तो उसे बार-बार वही अनुभव पाने की इच्छा होती है।

विशेषज्ञ बताते हैं कि यह प्रक्रिया धीरे-धीरे एक आदत का रूप ले लेती है और फिर आदत से आगे बढ़कर लत बन सकती है। कई युवाओं के लिए दिन की शुरुआत मोबाइल स्क्रीन देखने से होती है और रात को सोने से पहले तक वे किसी न किसी डिजिटल प्लेटफॉर्म से जुड़े रहते हैं। कुछ लोग तो हर कुछ मिनट में अपना फोन चेक करने लगते हैं, भले ही कोई जरूरी नोटिफिकेशन आया हो या नहीं।

मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह की निर्भरता का सबसे बड़ा असर एकाग्रता पर पड़ता है। लगातार बदलती डिजिटल सामग्री के कारण दिमाग छोटी-छोटी जानकारियों का आदी हो जाता है। परिणामस्वरूप पढ़ाई, काम या किसी एक विषय पर लंबे समय तक ध्यान केंद्रित करना कठिन हो जाता है। यही वजह है कि आज बड़ी संख्या में छात्र पढ़ाई के दौरान बार-बार फोन देखने की आदत से परेशान हैं।

डिजिटल एडिक्शन का प्रभाव केवल मानसिक स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है। लंबे समय तक स्क्रीन देखने से आंखों पर दबाव बढ़ता है, सिरदर्द की समस्या हो सकती है और नींद का चक्र भी प्रभावित हो सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार, देर रात तक मोबाइल चलाने से शरीर में मेलाटोनिन हार्मोन का उत्पादन प्रभावित होता है, जो अच्छी नींद के लिए जरूरी माना जाता है। इसके कारण नींद पूरी नहीं होती और अगले दिन थकान, चिड़चिड़ापन तथा तनाव जैसी समस्याएं बढ़ सकती हैं।

विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि सोशल मीडिया का अत्यधिक उपयोग युवाओं के आत्मविश्वास और भावनात्मक स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकता है। कई बार लोग सोशल मीडिया पर दूसरों की सफलता, जीवनशैली और उपलब्धियों को देखकर अपनी तुलना करने लगते हैं। इससे हीन भावना, तनाव और चिंता बढ़ सकती है। कुछ मामलों में यह स्थिति अवसाद तक का कारण बन सकती है।

ऑनलाइन गेमिंग भी युवाओं के बीच तेजी से बढ़ती एक बड़ी चुनौती बनकर उभरी है। कई युवा घंटों तक गेम खेलने में व्यस्त रहते हैं, जिससे उनकी पढ़ाई, नौकरी और पारिवारिक जीवन प्रभावित होने लगता है। कुछ मामलों में लोगों ने भोजन, नींद और सामाजिक गतिविधियों तक की अनदेखी कर दी है। विशेषज्ञ इसे गंभीर व्यवहारिक समस्या मानते हैं।

AIIMS के डॉक्टरों का मानना है कि डिजिटल एडिक्शन की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि अधिकांश लोग इसे समस्या मानते ही नहीं हैं। क्योंकि स्मार्टफोन और इंटरनेट आज की जरूरत बन चुके हैं, इसलिए लोगों को यह समझने में समय लगता है कि उनका उपयोग कब सामान्य सीमा से आगे बढ़कर निर्भरता का रूप ले चुका है। यदि कोई व्यक्ति बिना फोन के बेचैन महसूस करता है, बार-बार स्क्रीन चेक करता है या ऑनलाइन न होने पर तनाव महसूस करता है, तो यह डिजिटल निर्भरता का संकेत हो सकता है।

विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि युवाओं को अपने स्क्रीन टाइम पर नजर रखनी चाहिए। दिनभर में मोबाइल के उपयोग की समय सीमा तय करना, सोने से कम से कम एक घंटा पहले स्क्रीन से दूरी बनाना, परिवार और दोस्तों के साथ समय बिताना तथा खेलकूद और व्यायाम जैसी गतिविधियों में शामिल होना इस समस्या को कम करने में मदद कर सकता है। इसके अलावा सप्ताह में कुछ समय "डिजिटल डिटॉक्स" के लिए भी निकालना लाभदायक माना जाता है।

माता-पिता की भूमिका भी इस मामले में बेहद महत्वपूर्ण है। बच्चों और किशोरों को तकनीक का संतुलित उपयोग सिखाना, उनके ऑनलाइन व्यवहार पर नजर रखना और परिवार के साथ अधिक समय बिताने के लिए प्रेरित करना जरूरी है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि शुरुआती स्तर पर ही इस समस्या को पहचान लिया जाए तो इसके गंभीर परिणामों से बचा जा सकता है।

तकनीक और इंटरनेट आधुनिक जीवन का अभिन्न हिस्सा हैं और इनके अनेक फायदे भी हैं। लेकिन जब इनका उपयोग जरूरत से ज्यादा होने लगे और व्यक्ति के व्यवहार, स्वास्थ्य तथा सामाजिक जीवन को प्रभावित करने लगे, तो यह एक नई तरह के नशे का रूप ले सकता है। इसलिए विशेषज्ञ युवाओं को जागरूक रहने, संतुलित डिजिटल जीवनशैली अपनाने और समय-समय पर अपनी आदतों का मूल्यांकन करने की सलाह देते हैं। उनका मानना है कि सही संतुलन ही तकनीक के लाभ और मानसिक स्वास्थ्य दोनों को सुरक्षित रखने का सबसे प्रभावी तरीका है।

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