ट्रंप की हत्या की साजिश का दावा! इजरायल ने अमेरिका को दी थी स्नाइपर, चाकू और मिसाइल हमले की चेतावनी

इजरायल ने कथित तौर पर अमेरिका को चेतावनी दी थी कि ईरान राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को निशाना बनाने की साजिश रच सकता है। रिपोर्ट के मुताबिक, संभावित खतरों में स्नाइपर, चाकू और कंधे से दागी जाने वाली मिसाइल जैसे हमले शामिल थे। हालांकि, अमेरिकी और तुर्की खुफिया एजेंसियां इन विशिष्ट खतरों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं कर सकीं।

Aug 14, 2026 - 16:16
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ट्रंप की हत्या की साजिश का दावा! इजरायल ने अमेरिका को दी थी स्नाइपर, चाकू और मिसाइल हमले की चेतावनी

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सुरक्षा को लेकर एक बड़ा खुफिया दावा सामने आया है। रिपोर्ट के मुताबिक, इजरायल ने अमेरिका को कथित तौर पर कई बार चेतावनी दी थी कि ईरान ट्रंप की हत्या की साजिश रच सकता है। इन कथित खतरों में स्नाइपर, चाकू और कंधे से दागी जाने वाली मिसाइल जैसे हमलों की आशंका जताई गई थी।

बताया गया है कि इन चेतावनियों को अमेरिकी खुफिया एजेंसियों के साथ-साथ कुछ मामलों में व्हाइट हाउस के वरिष्ठ अधिकारियों तक भी पहुंचाया गया था। सबसे विस्तृत चेतावनी कथित तौर पर जुलाई में ट्रंप की तुर्की यात्रा से पहले सामने आई थी।

तुर्की यात्रा से पहले मिली थी चेतावनी

रिपोर्ट के अनुसार, जुलाई में अंकारा में हुए नाटो शिखर सम्मेलन से पहले अमेरिकी अधिकारियों को कथित खतरे की जानकारी दी गई थी। इजरायली अधिकारियों ने कथित तौर पर आशंका जताई थी कि ट्रंप की यात्रा के दौरान उन्हें निशाना बनाने की कोशिश हो सकती है।

संभावित हमले के तरीकों में कंधे से दागी जाने वाली मिसाइल का इस्तेमाल भी शामिल होने की बात कही गई थी। हालांकि, इन विशिष्ट खतरों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी थी।

इसके बावजूद, अमेरिकी सुरक्षा एजेंसियों ने एहतियात के तौर पर ट्रंप की सुरक्षा व्यवस्था को और मजबूत किया।

एयर फोर्स वन से दूसरे विमान में किया गया शिफ्ट?

रिपोर्ट में दावा किया गया है कि ट्रंप की तुर्की यात्रा के दौरान सीक्रेट सर्विस ने एक सुरक्षा योजना के तहत उन्हें एयर फोर्स वन से दूसरे विमान में शिफ्ट किया। इसे संभावित खतरे को भ्रमित करने और राष्ट्रपति की वास्तविक आवाजाही को सुरक्षित रखने की रणनीति के तौर पर देखा गया।

ट्रंप ने भी हाल में अपनी सुरक्षा और यात्रा से जुड़े कुछ असामान्य फैसलों का जिक्र किया था। हालांकि, यह स्पष्ट नहीं है कि सुरक्षा एजेंसियों द्वारा उठाए गए हर कदम का सीधा संबंध इजरायल की चेतावनी से था या नहीं।

ईरान और ट्रंप के बीच पुराना तनाव

अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, ट्रंप को लेकर ईरान से संभावित खतरे की चिंता नई नहीं है। अमेरिकी खुफिया एजेंसियां लंबे समय से यह मानती रही हैं कि ईरान 2020 में अमेरिकी ड्रोन हमले में मारे गए ईरानी सैन्य कमांडर कासिम सुलेमानी की मौत का बदला लेना चाहता है।

इसी पृष्ठभूमि में ट्रंप की सुरक्षा को लेकर अमेरिकी एजेंसियां पहले से सतर्क रही हैं। हालांकि, रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि इजरायली खुफिया एजेंसियों द्वारा बताए गए कुछ विशिष्ट खतरों की अमेरिकी खुफिया एजेंसियां स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं कर पाईं।

अमेरिकी और इजरायली खुफिया आकलन में अंतर

इस पूरे मामले में सबसे अहम पहलू अमेरिका और इजरायल की खुफिया एजेंसियों के आकलन में संभावित अंतर है।

रिपोर्ट के मुताबिक, कुछ मौकों पर CIA ने ईरान से जुड़े इजरायली खुफिया इनपुट पर अपेक्षाकृत कम भरोसा जताया था। इसका मतलब यह है कि इजरायल द्वारा बताए गए हर खतरे को अमेरिकी एजेंसियों ने समान स्तर पर विश्वसनीय नहीं माना।

ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर भी दोनों देशों के आकलनों में अंतर सामने आया है। अमेरिकी खुफिया एजेंसियों के आकलन और इजरायल के दावों में ईरान की परमाणु गतिविधियों तथा उससे पैदा होने वाले खतरे को लेकर मतभेद रहे हैं।

तुर्की ने भी नहीं की खतरे की स्वतंत्र पुष्टि

ट्रंप की तुर्की यात्रा से जुड़े कथित खतरे को लेकर एक और महत्वपूर्ण जानकारी सामने आई है। एक तुर्की अधिकारी के मुताबिक, तुर्की की खुफिया एजेंसी ने इजरायल द्वारा दी गई चेतावनी की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं की थी।

अधिकारी के अनुसार, तुर्की की खुफिया एजेंसियों को ऐसा कोई सबूत नहीं मिला था जो इस दावे की पुष्टि करता हो कि ईरान ट्रंप को तुर्की यात्रा के दौरान निशाना बनाने की योजना बना रहा था। यह जानकारी कथित तौर पर अमेरिकी अधिकारियों के साथ भी साझा की गई थी।

सुरक्षा को लेकर बढ़ी सतर्कता

इन दावों के बावजूद, ट्रंप की सुरक्षा को लेकर अमेरिकी एजेंसियों की सतर्कता कम नहीं हुई। इजरायल और ईरान के बीच तनाव तथा अमेरिका की क्षेत्रीय भूमिका को देखते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति की सुरक्षा एक संवेदनशील मुद्दा बनी हुई है।

हालांकि, यह महत्वपूर्ण है कि स्नाइपर, चाकू या मिसाइल से हमले की कथित योजनाओं की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। इसलिए इन दावों को स्थापित तथ्य के बजाय खुफिया चेतावनियों और रिपोर्ट किए गए आकलनों के रूप में देखा जाना चाहिए।

पूरे मामले ने यह सवाल जरूर खड़ा किया है कि अमेरिका और इजरायल के बीच खुफिया सूचनाओं को किस तरह साझा किया जा रहा है और ईरान से जुड़े संभावित खतरों का आकलन दोनों देश किस तरह कर रहे हैं।

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