अस्पताल से डिस्चार्ज होकर राजघाट पहुंचे सोनम वांगचुक, बोले- 'इस्तीफा एक शुरुआत, उम्मीद है सिस्टम बेहतर होगा'
अनशन समाप्त होने और अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक सीधे राजघाट पहुंचे। महात्मा गांधी को श्रद्धांजलि देने के बाद उन्होंने कहा कि केंद्रीय शिक्षा मंत्री के इस्तीफे को आंदोलन की जीत नहीं, बल्कि एक नई शुरुआत के रूप में देखा जाना चाहिए। उन्होंने उम्मीद जताई कि सरकार परीक्षा व्यवस्था में स्थायी और प्रभावी सुधार करेगी।
अस्पताल से डिस्चार्ज होकर राजघाट पहुंचे सोनम वांगचुक, बोले- 'इस्तीफा एक शुरुआत, उम्मीद है सिस्टम बेहतर होगा'
लगातार कई दिनों तक चले अनशन और अस्पताल में इलाज के बाद सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक सोमवार को डिस्चार्ज होने के बाद सीधे राजघाट पहुंचे, जहां उन्होंने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को श्रद्धांजलि अर्पित की। राजघाट पहुंचकर वांगचुक ने कहा कि शिक्षा मंत्री का इस्तीफा किसी आंदोलन का अंतिम लक्ष्य नहीं था, बल्कि यह एक नई शुरुआत है। उन्होंने उम्मीद जताई कि अब सरकार केवल नेतृत्व परिवर्तन तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि देश की परीक्षा प्रणाली में ऐसे स्थायी सुधार करेगी, जिससे भविष्य में किसी भी छात्र को पेपर लीक जैसी घटनाओं का सामना न करना पड़े।
राजघाट पर मीडिया से बातचीत के दौरान वांगचुक ने कहा कि उनका आंदोलन किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ नहीं था, बल्कि उस व्यवस्था के खिलाफ था जिसने लाखों छात्रों के भविष्य को संकट में डाल दिया। उन्होंने कहा कि यदि व्यवस्था में पारदर्शिता, जवाबदेही और तकनीकी सुरक्षा को मजबूत नहीं किया गया, तो केवल मंत्री बदलने से समस्या का स्थायी समाधान नहीं होगा। उनके अनुसार छात्रों का भरोसा तभी लौटेगा, जब परीक्षा प्रणाली पूरी तरह निष्पक्ष, सुरक्षित और विश्वसनीय बनेगी।
वांगचुक ने कहा कि केंद्रीय शिक्षा मंत्री का इस्तीफा लोकतांत्रिक जवाबदेही का संकेत जरूर है, लेकिन इसे अंत नहीं माना जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि अब असली परीक्षा सरकार की है कि वह पेपर लीक रोकने के लिए कितनी तेजी और गंभीरता से सुधार लागू करती है। उन्होंने उम्मीद जताई कि संसद में पेश किए गए पेपर लीक रोकथाम से जुड़े विधेयक और परीक्षा सुधारों के लिए गठित नई टास्क फोर्स के सुझावों को प्रभावी ढंग से लागू किया जाएगा।
उन्होंने अपने समर्थन में देशभर से आए छात्रों, अभिभावकों, शिक्षकों और नागरिकों का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि यह आंदोलन केवल एक संगठन का नहीं, बल्कि उन करोड़ों युवाओं की आवाज था जो निष्पक्ष प्रतियोगी परीक्षाओं की मांग कर रहे हैं। वांगचुक ने कहा कि छात्रों ने शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात रखी, जो भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत है।
राजघाट पर उन्होंने महात्मा गांधी के सत्य, अहिंसा और शांतिपूर्ण संघर्ष के सिद्धांतों का उल्लेख करते हुए कहा कि देश में किसी भी बड़े बदलाव की शुरुआत संवाद और जनभागीदारी से होती है। उन्होंने कहा कि उनका उद्देश्य कभी टकराव पैदा करना नहीं था, बल्कि सरकार और समाज का ध्यान उस समस्या की ओर आकर्षित करना था, जिसने लाखों युवाओं के भविष्य को प्रभावित किया।
वांगचुक ने यह भी कहा कि आने वाले समय में उनकी प्राथमिकता सरकार द्वारा उठाए जाने वाले सुधारात्मक कदमों पर नजर रखना होगी। उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि परीक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता बढ़ाने, तकनीकी सुरक्षा मजबूत करने और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने की दिशा में ठोस कदम उठाए जाते हैं, तो यह देश के छात्रों के लिए सबसे बड़ी जीत होगी। वहीं यदि सुधार केवल कागजों तक सीमित रहे, तो जनता और छात्र समुदाय अपनी आवाज लोकतांत्रिक तरीके से उठाना जारी रखेंगे।
उन्होंने सरकार से आग्रह किया कि परीक्षा आयोजित करने वाली एजेंसियों की कार्यप्रणाली को आधुनिक तकनीक से जोड़ा जाए, प्रश्नपत्रों की सुरक्षा के लिए डिजिटल सिस्टम विकसित किए जाएं और हर स्तर पर जवाबदेही तय की जाए। उनके मुताबिक, केवल सख्त कानून बनाने से नहीं, बल्कि उसके प्रभावी क्रियान्वयन से ही परीक्षा प्रणाली में वास्तविक बदलाव आएगा।
सोनम वांगचुक के राजघाट पहुंचने और दिए गए इस संदेश को उनके आंदोलन के अगले चरण के रूप में देखा जा रहा है। उनके बयान से साफ संकेत मिलता है कि वे अब टकराव की राजनीति के बजाय संस्थागत सुधारों पर जोर देना चाहते हैं। आने वाले दिनों में सरकार परीक्षा सुधारों को किस गति से लागू करती है और संसद में पेश विधेयक किस रूप में कानून बनता है, इस पर छात्रों, अभिभावकों और पूरे देश की नजरें टिकी रहेंगी।
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