8.65 करोड़ का पुल, लेकिन सड़क गायब! बिहार के ‘अजूबा पुल’ पर चंदे से लगी लोहे की सीढ़ियां

बिहार के समस्तीपुर जिले में 8.65 करोड़ रुपये की लागत से बना हाईटेक पुल आज भी बिना एप्रोच रोड के अधूरा पड़ा है। प्रशासनिक लापरवाही से परेशान ग्रामीणों ने खुद चंदा जुटाकर पुल पर चढ़ने के लिए लोहे की सीढ़ियां लगवाई हैं।

May 27, 2026 - 12:23
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8.65 करोड़ का पुल, लेकिन सड़क गायब! बिहार के ‘अजूबा पुल’ पर चंदे से लगी लोहे की सीढ़ियां

बिहार के समस्तीपुर जिले से विकास कार्यों और प्रशासनिक लापरवाही की एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जिसने पूरे सिस्टम पर सवाल खड़े कर दिए हैं। यहां करोड़ों रुपये की लागत से बना एक शानदार पुल आज भी लोगों के लिए पूरी तरह उपयोगी नहीं बन पाया है। वजह है — पुल के दोनों ओर एप्रोच रोड यानी पहुंच पथ का निर्माण नहीं होना। हालत यह है कि ग्रामीणों को पुल पर चढ़ने और उतरने के लिए खुद चंदा इकट्ठा कर लोहे की सीढ़ियां लगानी पड़ीं। अब लोग इन्हीं सीढ़ियों के सहारे जान जोखिम में डालकर पुल पार करने को मजबूर हैं।

यह मामला समस्तीपुर जिले के रोसड़ा प्रखंड स्थित कलवाड़ा घाट का है, जहां मृत बागमती नदी पर लगभग 8 करोड़ 65 लाख रुपये की लागत से एक हाईटेक पुल बनाया गया। पुल का निर्माण तो पूरा हो गया, लेकिन उससे जुड़ने वाली सड़कें नहीं बन सकीं। नतीजा यह हुआ कि करोड़ों का यह पुल कई वर्षों से “अजूबा पुल” बनकर खड़ा है। 

स्थानीय लोगों का कहना है कि शुरुआत में उन्हें उम्मीद थी कि पुल बनने से खानपुर और रोसड़ा प्रखंड के गांवों के बीच आवाजाही आसान हो जाएगी। किसानों को अपनी फसल बाजार तक पहुंचाने में सुविधा होगी और बच्चों को स्कूल जाने में परेशानी नहीं होगी। लेकिन पुल बनने के बाद भी हालात पहले जैसे ही बने हुए हैं। 

ग्रामीणों के मुताबिक एप्रोच रोड नहीं बनने के कारण पुल की ऊंचाई तक पहुंचना बेहद मुश्किल था। प्रशासन और जनप्रतिनिधियों से बार-बार शिकायत करने के बावजूद कोई कार्रवाई नहीं हुई। आखिरकार गांव वालों ने आपस में चंदा इकट्ठा किया और पुल पर चढ़ने के लिए लोहे की सीढ़ियां लगवा दीं। अब करीब 10 हजार लोग रोजाना इन्हीं सीढ़ियों के जरिए पुल पार करते हैं। 

सबसे ज्यादा परेशानी स्कूली बच्चों, बुजुर्गों और मरीजों को हो रही है। बारिश के मौसम में सीढ़ियां फिसलन भरी हो जाती हैं, जिससे हादसे का खतरा और बढ़ जाता है। ग्रामीणों का कहना है कि कई लोग पुल से उतरते समय गिरकर घायल भी हो चुके हैं। 

स्थानीय किसान बताते हैं कि पुल बनने से पहले उन्हें उम्मीद थी कि उनकी आर्थिक स्थिति सुधरेगी, क्योंकि अब फसल आसानी से मंडियों तक पहुंचाई जा सकेगी। लेकिन पुल का उपयोग ठीक से न हो पाने के कारण उन्हें आज भी लंबा चक्कर लगाकर दूसरे रास्तों से जाना पड़ता है। इससे समय और पैसा दोनों बर्बाद हो रहे हैं।

ग्रामीणों का आरोप है कि पुल निर्माण के दौरान ही एप्रोच रोड को लेकर भूमि विवाद सामने आया था, लेकिन प्रशासन ने समय रहते समाधान नहीं निकाला। इसी कारण सड़क निर्माण का काम अटक गया। लोगों का कहना है कि अगर प्रशासन चाहता तो बातचीत और मुआवजे के जरिए समस्या हल की जा सकती थी।

इस मामले के सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर भी पुल की तस्वीरें तेजी से वायरल हो रही हैं। लोग इसे “बिहार का अजूबा पुल” और “इंजीनियरिंग का नमूना” बताते हुए सरकारी सिस्टम पर सवाल उठा रहे हैं। कई यूजर्स ने पूछा कि जब सड़क ही नहीं बनानी थी तो पुल बनाने पर करोड़ों रुपये क्यों खर्च किए गए।

विपक्षी दलों ने भी इस मुद्दे को लेकर राज्य सरकार पर निशाना साधा है। उनका कहना है कि बिहार में विकास कार्य सिर्फ कागजों तक सीमित हैं और जमीनी स्तर पर योजनाओं की हालत बेहद खराब है। वहीं स्थानीय प्रशासन का कहना है कि एप्रोच रोड निर्माण के लिए प्रक्रिया चल रही है और जल्द समाधान निकालने की कोशिश की जाएगी। 

इंजीनियरिंग विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी पुल परियोजना में एप्रोच रोड सबसे अहम हिस्सा होता है। बिना सड़क के पुल का कोई व्यावहारिक महत्व नहीं रह जाता। ऐसे में यह मामला सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि योजना निर्माण और निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल खड़े करता है।

फिलहाल ग्रामीणों की मांग है कि जल्द से जल्द पुल के दोनों ओर पहुंच पथ बनाया जाए और पुल की गुणवत्ता की भी जांच कराई जाए। लोगों का कहना है कि करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद अगर उन्हें सीढ़ियों के सहारे पुल पार करना पड़े, तो यह विकास नहीं बल्कि सिस्टम की विफलता है।

समस्तीपुर का यह “अजूबा पुल” अब बिहार में अधूरे विकास कार्यों और सरकारी लापरवाही का बड़ा प्रतीक बन चुका है।

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