Jagannath Rath Yatra: क्यों हर 12 साल में बदली जाती है भगवान जगन्नाथ की मूर्ति? जानें नवकलेवर का दिव्य रहस्य

पुरी के भगवान जगन्नाथ मंदिर में हर 12 से 19 साल के बीच होने वाली 'नवकलेवर' परंपरा में भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की काष्ठ मूर्तियां बदली जाती हैं। जानिए इस अनूठी परंपरा का धार्मिक महत्व, इसके पीछे का रहस्य और पूरी प्रक्रिया।

Jul 4, 2026 - 11:04
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Jagannath Rath Yatra: क्यों हर 12 साल में बदली जाती है भगवान जगन्नाथ की मूर्ति? जानें नवकलेवर का दिव्य रहस्य

Jagannath Rath Yatra: क्यों हर 12 साल में बदली जाती है भगवान जगन्नाथ की मूर्ति? जानें नवकलेवर का दिव्य रहस्य

भारत के चार प्रमुख धामों में शामिल ओडिशा के पुरी स्थित श्री जगन्नाथ मंदिर की महिमा पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है। हर वर्ष निकलने वाली जगन्नाथ रथ यात्रा में लाखों श्रद्धालु भगवान जगन्नाथ, बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के दर्शन के लिए पुरी पहुंचते हैं। लेकिन इस मंदिर से जुड़ी एक ऐसी परंपरा भी है, जो दुनिया के किसी अन्य मंदिर में शायद ही देखने को मिलती हो।

यह परंपरा है 'नवकलेवर' की। इसके तहत भगवान जगन्नाथ, बलभद्र, देवी सुभद्रा और सुदर्शन चक्र की काष्ठ (लकड़ी) से बनी मूर्तियों को निश्चित अंतराल पर बदल दिया जाता है। आम धारणा है कि यह हर 12 साल में होता है, लेकिन वास्तव में यह 12 से 19 वर्षों के बीच उस वर्ष होता है जब हिंदू पंचांग के अनुसार आषाढ़ मास में अधिक मास (दो आषाढ़) पड़ता है।

आइए जानते हैं इस अनूठी परंपरा का रहस्य, धार्मिक महत्व और इससे जुड़ी पूरी प्रक्रिया।

क्या है नवकलेवर?

'नवकलेवर' दो शब्दों से मिलकर बना है—'नव' यानी नया और 'कलेवर' यानी शरीर। इसका अर्थ है नया शरीर धारण करना

हिंदू धर्म में माना जाता है कि आत्मा अमर होती है और केवल शरीर बदलता है। इसी सिद्धांत को भगवान जगन्नाथ की मूर्तियों पर भी लागू किया जाता है। माना जाता है कि भगवान अपनी दिव्य आत्मा को पुराने शरीर से नए शरीर में स्थानांतरित करते हैं।

इसी कारण पुरानी मूर्तियों को सम्मानपूर्वक समाधि दी जाती है और नई मूर्तियों की स्थापना की जाती है।

हर 12 साल में ही क्यों बदलती है मूर्ति?

आमतौर पर लोग मानते हैं कि मूर्तियां हर 12 साल में बदली जाती हैं, लेकिन वास्तविकता थोड़ी अलग है।

नवकलेवर तभी आयोजित होता है जब हिंदू पंचांग में आषाढ़ महीने में अधिक मास आता है। यह खगोलीय गणना पर आधारित होता है, इसलिए इसका अंतराल लगभग 12 से 19 वर्ष के बीच हो सकता है।

इसी कारण नवकलेवर हर बार ठीक 12 वर्ष बाद नहीं होता।

नीम के विशेष वृक्ष से बनती हैं मूर्तियां

भगवान जगन्नाथ की नई मूर्तियां किसी भी साधारण लकड़ी से नहीं बनाई जातीं। इसके लिए विशेष नीम के वृक्ष (दारु ब्रह्म) की खोज की जाती है।

इन वृक्षों के चयन के लिए कई धार्मिक मानदंड तय हैं, जैसे—

  • वृक्ष के पास नदी या जल स्रोत होना चाहिए।
  • आसपास श्मशान या देवस्थान होना चाहिए।
  • वृक्ष पर पक्षियों का घोंसला नहीं होना चाहिए।
  • उसमें कीड़े या रोग नहीं होने चाहिए।
  • तने पर शंख, चक्र, गदा या पद्म जैसे प्राकृतिक चिह्न होने चाहिए।

इन सभी संकेतों के मिलने पर ही उस वृक्ष को भगवान की मूर्ति बनाने योग्य माना जाता है।

कैसे होती है दारु की खोज?

इस प्रक्रिया को 'बनयागा यात्रा' कहा जाता है। मंदिर के दैतापति सेवक, पुजारी और अन्य धार्मिक अधिकारी विशेष पूजा-अर्चना के बाद पवित्र वृक्ष की खोज के लिए निकलते हैं।

मान्यता है कि उन्हें देवी मंगला स्वप्न में संकेत देती हैं कि कौन-सा वृक्ष भगवान की मूर्ति के लिए उपयुक्त है।

वृक्ष मिलने के बाद वैदिक मंत्रोच्चार के बीच उसकी पूजा की जाती है और फिर विशेष विधि से उसे काटकर पुरी लाया जाता है।

सबसे रहस्यमयी प्रक्रिया—ब्रह्म परिवर्तन

नवकलेवर की सबसे रहस्यमयी रस्म 'ब्रह्म परिवर्तन' मानी जाती है।

इस दौरान पुरानी मूर्ति के भीतर स्थापित दिव्य तत्व या 'ब्रह्म पदार्थ' को नई मूर्ति में स्थापित किया जाता है। यह प्रक्रिया आधी रात को अत्यंत गोपनीय तरीके से होती है।

परंपरा के अनुसार, इस समय मंदिर की सभी लाइटें बंद कर दी जाती हैं। केवल चुनिंदा दैतापति सेवकों को ही इस अनुष्ठान में शामिल होने की अनुमति होती है। वे आंखों पर पट्टी और हाथों में कपड़ा बांधकर यह प्रक्रिया पूरी करते हैं। इस रहस्य के बारे में आज तक कोई सार्वजनिक जानकारी उपलब्ध नहीं है।

पुरानी मूर्तियों का क्या होता है?

ब्रह्म परिवर्तन के बाद पुरानी मूर्तियों को मंदिर परिसर के कोइली वैकुंठ नामक स्थान पर पूरे धार्मिक सम्मान के साथ समाधि दी जाती है।

यह प्रक्रिया भी अत्यंत पवित्र मानी जाती है और सीमित लोगों की उपस्थिति में संपन्न होती है।

रथ यात्रा से पहले होता है विशेष अनुष्ठान

नई मूर्तियों की स्थापना के बाद भगवान का विशेष श्रृंगार, पूजा और अनुष्ठान किए जाते हैं। इसके बाद भगवान पहली बार श्रद्धालुओं को दर्शन देते हैं, जिसे 'नवयौवन दर्शन' कहा जाता है।

इसके कुछ समय बाद विश्व प्रसिद्ध जगन्नाथ रथ यात्रा का आयोजन होता है, जिसमें भगवान अपने भाई-बहन के साथ भव्य रथों पर विराजमान होकर गुंडिचा मंदिर की यात्रा करते हैं।

धार्मिक महत्व

नवकलेवर केवल मूर्तियों को बदलने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह जीवन, मृत्यु और पुनर्जन्म के सनातन सिद्धांत का प्रतीक माना जाता है।

यह परंपरा यह संदेश देती है कि शरीर नश्वर है, लेकिन आत्मा अमर है। यही दर्शन भगवद्गीता में भी वर्णित है कि आत्मा केवल शरीर बदलती है, उसका कभी नाश नहीं होता।

लाखों श्रद्धालुओं की आस्था

जब भी नवकलेवर होता है, देश-विदेश से करोड़ों श्रद्धालु पुरी पहुंचते हैं। इसे देखने का अवसर अत्यंत दुर्लभ माना जाता है क्योंकि यह हर वर्ष नहीं होता।

श्रद्धालु मानते हैं कि इस दौरान भगवान के दर्शन करने से विशेष आध्यात्मिक फल की प्राप्ति होती है।

निष्कर्ष

भगवान जगन्नाथ की मूर्तियों का समय-समय पर बदलना दुनिया की सबसे अनोखी धार्मिक परंपराओं में से एक है। हालांकि आम तौर पर इसे "हर 12 साल" की परंपरा कहा जाता है, लेकिन वास्तव में नवकलेवर 12 से 19 वर्षों के बीच, आषाढ़ में अधिक मास पड़ने पर आयोजित होता है।

नीम के पवित्र वृक्ष की खोज से लेकर रहस्यमयी ब्रह्म परिवर्तन और पुरानी मूर्तियों को सम्मानपूर्वक समाधि देने तक, यह पूरी प्रक्रिया सनातन परंपरा, आस्था और आध्यात्मिक दर्शन का अद्भुत संगम है। यही कारण है कि जगन्नाथ रथ यात्रा और नवकलेवर आज भी करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बने हुए हैं।

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