बंगाल बैटल की ‘सेकंड इनिंग’! अब ममता बनर्जी की नई ‘विधानसभा’ बना कलकत्ता हाईकोर्ट
पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक बार फिर हलचल तेज हो गई है। Mamata Banerjee सरकार से जुड़े कई बड़े मामलों पर Calcutta High Court की लगातार सख्त टिप्पणियों और सुनवाई के बाद विपक्ष ने अदालत को ही “नई विधानसभा” कहना शुरू कर दिया है। इससे राज्य में राजनीति और न्यायपालिका के बीच टकराव की बहस तेज हो गई है।
पश्चिम बंगाल में राजनीतिक माहौल एक बार फिर पूरी तरह गर्म हो चुका है और इस बार सत्ता और विपक्ष की सबसे बड़ी लड़ाई विधानसभा से ज्यादा अदालत के गलियारों में दिखाई दे रही है। राज्य सरकार से जुड़े कई संवेदनशील मामलों पर लगातार सुनवाई और सख्त टिप्पणियों के चलते Calcutta High Court अब बंगाल की राजनीति का नया केंद्र बनता नजर आ रहा है।
विपक्षी दल लगातार यह आरोप लगा रहे हैं कि राज्य सरकार से जुड़े कई फैसलों पर जवाबदेही अब विधानसभा में नहीं बल्कि अदालत में तय हो रही है, इसलिए हाईकोर्ट ही “नई विधानसभा” बन गया है। यही वजह है कि बंगाल की राजनीति में “सेकंड इनिंग” जैसी स्थिति बन गई है जहां हर नया विवाद अदालत तक पहुंच रहा है और वहां से निकलने वाली टिप्पणियां सीधे राजनीतिक माहौल को प्रभावित कर रही हैं।
बीते कुछ महीनों में शिक्षक भर्ती घोटाले, प्रशासनिक नियुक्तियों, कानून-व्यवस्था और कई सरकारी फैसलों को लेकर अदालत में लगातार सुनवाई होती रही है। कई मामलों में अदालत ने राज्य सरकार के कामकाज पर सवाल उठाए, जिसके बाद विपक्ष को सरकार पर हमला करने का नया मौका मिल गया। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि बंगाल में अब कानूनी लड़ाई और राजनीतिक लड़ाई एक-दूसरे से जुड़ चुकी हैं।
हर सुनवाई के बाद सियासी बयानबाज़ी और तेज हो जाती है, जिससे राज्य का राजनीतिक तापमान लगातार बढ़ रहा है। दूसरी ओर, Mamata Banerjee और उनकी पार्टी का कहना है कि विपक्ष अदालत का इस्तेमाल राजनीतिक हथियार के तौर पर कर रहा है और जानबूझकर हर मुद्दे को न्यायपालिका तक ले जाया जा रहा है ताकि सरकार की छवि को नुकसान पहुंचाया जा सके।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, बंगाल में यह टकराव आने वाले चुनावों से पहले और ज्यादा बड़ा रूप ले सकता है। अदालत की सक्रियता को कुछ लोग लोकतंत्र के संतुलन के लिए जरूरी बता रहे हैं, जबकि सत्तारूढ़ दल इसे राजनीतिक एजेंडा मान रहा है। सोशल मीडिया पर भी इस मुद्दे को लेकर जबरदस्त बहस छिड़ी हुई है।
कई लोग कह रहे हैं कि अगर विधानसभा में विपक्ष की आवाज कमजोर पड़ती है तो अदालत ही आखिरी उम्मीद बन जाती है, जबकि कुछ लोगों का मानना है कि न्यायपालिका को राजनीति का अखाड़ा बनाना सही नहीं है। कुल मिलाकर, पश्चिम बंगाल में अदालत और राजनीति का यह नया समीकरण राज्य की राजनीति को और ज्यादा तीखा और दिलचस्प बना रहा है, जहां अब हर बड़ा राजनीतिक विवाद सीधे हाईकोर्ट के दरवाजे तक पहुंचता दिखाई दे रहा है।
इसके अलावा, बंगाल की राजनीति में अदालत की बढ़ती भूमिका ने प्रशासनिक फैसलों पर भी बड़ा असर डालना शुरू कर दिया है। कई सरकारी अधिकारियों और विभागों पर अब फैसले लेते समय कानूनी चुनौती का दबाव साफ दिखाई देता है। विपक्ष लगातार यह दावा कर रहा है कि राज्य में कई मामलों में पारदर्शिता की कमी रही, जिसकी वजह से अदालत को बार-बार दखल देना पड़ रहा है।
वहीं आम जनता के बीच भी यह धारणा बन रही है कि अब राज्य की सबसे बड़ी राजनीतिक बहसें विधानसभा से ज्यादा कोर्टरूम में लड़ी जा रही हैं। यही कारण है कि हर नई सुनवाई मीडिया और सोशल मीडिया पर बड़ी सुर्खियां बन रही है और राजनीतिक दल इसे अपने-अपने तरीके से भुनाने की कोशिश कर रहे हैं।
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