दिलजीत दोसांझ की 'सतलुज' विवाद पर अन्नू कपूर का बड़ा बयान, बोले- जनता से रहम मत मांगो, कोर्ट का दरवाजा खटखटाओ
दिलजीत दोसांझ की फिल्म 'सतलुज' को लेकर जारी विवाद के बीच अभिनेता अन्नू कपूर ने अपनी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि अगर किसी कलाकार या फिल्ममेकर को लगता है कि उनके साथ गलत हुआ है तो उन्हें जनता से सहानुभूति मांगने के बजाय कानूनी रास्ता अपनाना चाहिए।
'सतलुज' विवाद पर अन्नू कपूर का करारा जवाब, बोले- अगर शिकायत है तो कोर्ट जाओ, जनता से सहानुभूति मत मांगो
दिलजीत दोसांझ की फिल्म 'सतलुज' इन दिनों रिलीज और सेंसर विवाद को लेकर चर्चा में है। फिल्म को लेकर उठे विवाद के बीच अभिनेता अन्नू कपूर ने एक ऐसा बयान दिया है, जिसने नई बहस को जन्म दे दिया है। अन्नू कपूर ने कहा कि अगर किसी फिल्मकार या कलाकार को लगता है कि उसके साथ अन्याय हुआ है तो उसे जनता से रहम या भावनात्मक समर्थन मांगने के बजाय अदालत का रास्ता अपनाना चाहिए। उनका कहना है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में कानूनी प्रक्रिया ही सबसे बड़ा माध्यम है, जहां किसी भी फैसले को चुनौती दी जा सकती है।
फिल्म 'सतलुज', जिसमें दिलजीत दोसांझ मुख्य भूमिका में हैं, रिलीज के बाद विवादों में घिर गई। रिपोर्ट्स के मुताबिक फिल्म को लेकर सेंसर सर्टिफिकेशन और रिलीज प्रक्रिया पर सवाल उठे, जिसके बाद इसकी उपलब्धता को लेकर भी विवाद पैदा हुआ। फिल्म को लेकर अलग-अलग पक्षों की अपनी राय सामने आ रही है। कुछ लोग इसे अभिव्यक्ति की आजादी का मुद्दा बता रहे हैं, जबकि कुछ लोग फिल्म की सामग्री और उसके प्रभाव को लेकर सवाल उठा रहे हैं।
अन्नू कपूर ने इसी विवाद पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि कलाकारों को अपनी बात रखने का अधिकार है, लेकिन किसी भी विवाद का समाधान नियमों और कानून के अनुसार होना चाहिए। उन्होंने इशारा किया कि अगर किसी को सेंसर बोर्ड, सरकार या किसी अन्य संस्था के फैसले से परेशानी है तो अदालत एक स्वतंत्र मंच है, जहां अपनी बात रखी जा सकती है।
उनके इस बयान को फिल्म इंडस्ट्री में चल रही सेंसरशिप और क्रिएटिव फ्रीडम की बहस से जोड़कर देखा जा रहा है। पिछले कुछ वर्षों में कई फिल्मों को लेकर विवाद सामने आए हैं, जहां फिल्म निर्माताओं और सेंसर बोर्ड के बीच मतभेद देखने को मिले हैं। ऐसे मामलों में कई बार मामला अदालत तक पहुंचा है और न्यायपालिका ने अंतिम निर्णय दिया है।
'सतलुज' को लेकर भी यही स्थिति देखने को मिली है। फिल्म के निर्देशक हनी त्रेहान ने पहले ही कहा है कि फिल्म को किसी समुदाय या वर्ग के खिलाफ नहीं बनाया गया है और इसका उद्देश्य किसी तरह का विवाद पैदा करना नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि दर्शकों ने फिल्म को सकारात्मक तरीके से देखा है।
वहीं, फिल्म के समर्थन में कई फिल्मी हस्तियां भी सामने आई हैं। कुछ कलाकारों और निर्माताओं का कहना है कि फिल्मों को दर्शकों तक पहुंचने का मौका मिलना चाहिए और किसी भी कहानी को रोकने से पहले उचित प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए। उनका तर्क है कि दर्शकों को यह तय करने का अधिकार होना चाहिए कि वे किसी फिल्म को कैसे देखते हैं।
दूसरी तरफ, विरोध करने वाले पक्षों का कहना है कि फिल्मों का समाज पर प्रभाव पड़ता है और संवेदनशील विषयों को दिखाते समय सावधानी जरूरी है। इसी कारण भारत में फिल्मों की रिलीज से पहले सेंसर प्रमाणन की प्रक्रिया मौजूद है।
अन्नू कपूर का बयान ऐसे समय में आया है जब बॉलीवुड में एक बार फिर यह बहस तेज हो गई है कि फिल्मों की आजादी और सामाजिक जिम्मेदारी के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। उनका मानना है कि विवादों को सड़क या सोशल मीडिया पर लड़ने के बजाय संवैधानिक संस्थाओं के जरिए हल किया जाना चाहिए।
उन्होंने अपने बयान से यह संदेश देने की कोशिश की कि किसी भी कलाकार को अपनी बात रखने का अधिकार है, लेकिन व्यवस्था के खिलाफ जाने के बजाय कानूनी रास्ता अपनाना ज्यादा प्रभावी तरीका है। उनके अनुसार, अदालतें इसी उद्देश्य के लिए हैं कि जब किसी व्यक्ति या संस्था को किसी फैसले से आपत्ति हो तो वह वहां न्याय की मांग कर सके।
दिलजीत दोसांझ की फिल्म 'सतलुज' पहले भी चर्चा में रही है। फिल्म मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन से प्रेरित बताई जाती है और इसकी कहानी को लेकर काफी समय से बहस चल रही है। फिल्म के कंटेंट और सेंसर प्रक्रिया को लेकर कई सवाल उठते रहे हैं।
इस पूरे मामले ने एक बार फिर भारतीय सिनेमा में सेंसरशिप, ऐतिहासिक विषयों पर फिल्म बनाने की स्वतंत्रता और कलाकारों की जिम्मेदारी जैसे मुद्दों को सामने ला दिया है। जहां एक तरफ फिल्म निर्माता अपनी रचनात्मक स्वतंत्रता की बात कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ कुछ लोग फिल्मों के सामाजिक प्रभाव को लेकर चिंता जता रहे हैं।
फिलहाल 'सतलुज' विवाद पर बहस जारी है और आने वाले दिनों में कानूनी प्रक्रिया इस मामले की दिशा तय कर सकती है। अन्नू कपूर के बयान ने इस विवाद में एक नया नजरिया जरूर जोड़ दिया है, जहां उन्होंने भावनात्मक अपील की जगह न्यायिक रास्ते को प्राथमिकता देने की बात कही है।
अब देखना होगा कि 'सतलुज' विवाद किस दिशा में आगे बढ़ता है और क्या फिल्म को लेकर अंतिम फैसला अदालत या संबंधित संस्थाओं के जरिए सामने आता है।
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